चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था के लिए जैव-विनिर्माण पर लोकार्पण कार्यक्रम-सह-कार्यशाला; कार्बन कैप्चर एवं उनके उपयोग (सीसीयू): प्रौद्योगिकी विकास, प्रायोगिक तैनाती एवं नीति एकीकरण
चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था के लिए जैव-विनिर्माण पर लोकार्पण कार्यक्रम-सह-कार्यशाला; कार्बन कैप्चर एवं उनके उपयोग (सीसीयू): प्रौद्योगिकी विकास, प्रायोगिक तैनाती एवं नीति एकीकरण
नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. सारस्वत ने ‘कार्बन कैप्चर एवं उनके उपयोग के लिए जैव-विनिर्माण’ नामक पुस्तिका का विमोचन किया, जिसमें कार्बन कैप्चर एवं उनके उपयोग के लिए प्रयोगशाला से लेकर क्षेत्र स्तर तक तैनात हो सकने वाले जैव समाधानों को प्रदर्शित करने वाली परियोजनाओं का एक समूह शामिल है।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने औद्योगिक कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के लिए जैव-विनिर्माण समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करने वाली परियोजनाओं की घोषणा की है।
कार्बन डाइऑक्साइड से चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था तक: बायोई3 नीति के तत्वावधान में औद्योगिक उत्सर्जन को स्थायी मूल्य में परिवर्तित करने के लिए जैव-विनिर्माण नवाचारों को बढ़ावा देना।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने बायोई3 नीति के तत्वावधान में, चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण के माध्यम से औद्योगिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का उपयोग करने एवं उसे मूल्यवर्धित उत्पादों में परिवर्तित करने के उद्देश्य से परियोजनाओं की घोषणा की।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), भारत सरकार ने अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) के साथ मिलकर 23 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान (एनआईआई), नई दिल्ली में “चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था के लिए जैव-विनिर्माण; कार्बन कैप्चर एवं उनके उपयोग (सीसीयू): प्रौद्योगिकी विकास, प्रायोगिक तैनाती एवं नीति एकीकरण” विषय पर एक लोकार्पण कार्यक्रम-सह-कार्यशाला का आयोजन किया। इस आयोजन ने जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील विकास की दिशा में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की, जिसके अंतर्गत बायोई3 नीति के अंतर्गत डीबीटी-बीआईआरएसी समर्थित सीसीयू परियोजनाओं के एक नए समूह की औपचारिक शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम में पूरे देश के वैज्ञानिक, नीति निर्माता, उद्योगपति, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थान एक चक्रीय एवं कम कार्बन वाली जैव अर्थव्यवस्था के लिए जैव-विनिर्माण आधारित समाधानों को बढ़ावा देने पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए।
इस कार्यक्रम में डॉ. वी.के. सरस्वत, सदस्य, नीति आयोग मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। डॉ. सरस्वत ने ‘कार्बन कैप्चर एवं इसके उपयोग के लिए जैव-विनिर्माण’ शीर्षक वाली पुस्तिका का विमोचन किया और औपचारिक रूप से डीबीटी-बीआईआरएसी समर्थित सीसीयू परियोजनाओं के कार्यान्वयन की घोषणा की। सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सीसीयू-सक्षम जैव-विनिर्माण औद्योगिक उत्सर्जन में कमी लाने के लिए व्यावहारिक और पैमाने पर मार्ग प्रदान करता है, साथ ही नए मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण करता है और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि अकादमिक जगत, उद्योग और नीति में सतत सहयोग सीसीयू नवाचारों को पायलट परियोजना से वृहद पैमाने पर लागू करने के लिए महत्वपूर्ण होगा, जिससे भारत की नेट जीरो 2070 प्रतिबद्धता को समर्थन मिलेगा और विकसित भारत 2047 के व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाएगा।
इस अवसर पर, डॉ. राजेश एस. गोखले, डीबीटी के सचिव, बीआरआईसी के महानिदेशक और बीआईआरएसी के अध्यक्ष ने बायोई3 नीति के अंतर्गत सीसीयू-सक्षम जैव-विनिर्माण के लिए राष्ट्रीय दृष्टिकोण को एक हरित, समावेशी एवं चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था में एक बदलाव के रूप में व्यक्त किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कार्बन कैप्चर एवं उनके उपयोग को जैव-विनिर्माण के साथ एकीकृत करने से कार्बन डाइऑक्साइड को एक मूल्यवान कच्चे माल के रूप में उपयोग करके डीकार्बोनाइजेशन, डिफ़ॉसिलाइजेशन और शून्य-अपशिष्ट औद्योगिक विकास संभव हो सकता है। डॉ. गोखले ने सीसीयू को बायोई3 का एक मूलभूत स्तंभ बताया और कहा कि कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना जैसी सहायक संरचना उद्योग में इसके अपनाने की प्रक्रिया को गति प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि सीसीयू संचालित जैव-विनिर्माण को एक प्रणाली-स्तरीय मध्यवर्तन के रूप में देखा जाना चाहिए जो चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण के माध्यम से उद्योग को कार्बन मुक्त करने के लिए व्यावहारिक समाधानों के लिए विज्ञान को एकीकृत करता है और हरित विकास एवं विनिर्माण के माध्यम से भारत की दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धताओं का समर्थन करता है।
डॉ. जितेंद्र कुमार, बीआईआरएसी के प्रबंध निदेशक ने कहा कि ‘सीसीयू पर यह पहल भारत को जैविक कार्बन मूल्यवर्धन एवं पुनरुत्पादक जैव-अर्थव्यवस्था समाधानों में वैश्विक रूप से अग्रणी बनाएगी, जिससे देश की नवाचार एवं औद्योगिक क्षमता का प्रदर्शन होगा। डॉ. देबासिसा मोहंती, राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान की निदेशक ने कार्यक्रम में अपना स्वागत भाषण दिया।
तकनीकी विचार-विमर्श का उद्देश्य शिक्षा एवं उद्योग जगत को घनिष्ठ रूप से आपस में जोड़ना था, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों ने जैव-आधारित सीसीयू प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया और आदित्य बिरला समूह, जिंदल स्टील एंड पावर, प्राज इंडस्ट्रीज, 4एनबायो, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड और आईओसीएल सहित उपयोगकर्ता उद्योगों ने परिचालन आवश्यकताओं, विस्तार एवं तैनाती संबंधी विचारों पर अपनी अंतर्दृष्टियों को साझा किया ताकि प्रौद्योगिकी विकास एवं औद्योगिक अनुप्रयोग के बीच के अंतर को समझा जा सके और साथ ही मापणीय सीसीयू समाधानों के लिए साझेदारी विकसित की जा सके।
इस्पात एवं लोहा, ईंधन एवं रसायन, फाइबर एवं वस्त्र तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने औद्योगिक आवश्यकताओं पर अपनी-अपनी बहुमूल्य जानकारी साझा की और उत्सर्जन में कमी लाने के लिए एक व्यवहार्य मार्ग के रूप में सीसीयू में उद्योग की बढ़ती रुचि पर प्रकाश डाला, साथ ही नए मूल्य श्रृंखलाओं के लिए अवसर उत्पन्न करने एवं सतत विनिर्माण प्रथाओं को आगे बढ़ाने पर भी बल दिया।
इस आयोजन का अभिन्न अंग के रूप में रणनीतिक कार्यशाला एवं चर्चा सत्र शामिल थे, जहां जैव रूपांतरण एवं सिंथेटिक जीव विज्ञान, विद्युत-जैविक एकीकरण एवं रिएक्टर अभियांत्रिकी, उत्पाद विकास एवं बाजार रणनीतियां तथा नीति, वित्त औएवं उद्यमिता जैसे प्राथमिकता वाले विषयों पर केंद्रित विचार-विमर्श संभव हो सका। इन सत्रों ने औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप सीसीयू प्रौद्योगिकियों को स्थापित करने, शिक्षाविदों को उद्योग भागीदारों से जोड़ने, नवाचार मूल्य श्रृंखला में सहभागिता को मजबूत करने तथा अपनाने की प्रक्रिया को गति प्रदान करने के लिए नीति एवं वित्तपोषण तंत्रों की पहचान करने पर समग्र दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए रचनात्मक संवाद को सुगम बनाया।
विचार-विमर्श में कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग के लिए द्विविनिर्माण समाधानों को पायलट एवं जमीनी स्तर पर एक साथ प्रदर्शित करने के लिए साझा क्लस्टर बनाने के लिए समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया गया। साथ ही, साझा अवसंरचना के लिए तैनाती स्तर का निर्माण, स्वदेशी बौद्धिक संपदा उत्पन्न करने तथआ सहायक नीति एवं नियामक संरचना तैयार करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया। विचारों के आदान-प्रदान के कारण औद्योगिक उत्सर्जन से निपटने के लिए सीसीयू संचालित जैव-विनिर्माण समाधानों के प्रायोगिक एवं क्षेत्रीय स्तर पर तैनाती को विस्तारित उद्योग-अकादमिक सहयोग प्राप्त हुआ।