जनजातीय चिकित्सकों का सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा में एकीकरण: जनजातीय चिकित्सकों के लिए राष्ट्रीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम
जनजातीय चिकित्सकों का सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा में एकीकरण: जनजातीय चिकित्सकों के लिए राष्ट्रीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम
जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 16 जनवरी 2026 को हैदराबाद के कान्हा शांति वनम csx जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए जनजातीय चिकित्सकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में जनजातीय चिकित्सकों को औपचारिक रूप से मान्यता प्रदान करने एवं उन्हें सहयोगी भागीदार के रूप में शामिल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और अपनी तरह की पहली राष्ट्रीय पहल है, जो प्रधानमंत्री के समावेशी, अंतिम-मील और समुदाय-नेतृत्व के माध्यम से एक विकसित भारत के निर्माण वाले दृष्टिकोण के अनुरूप है।
उद्घाटन सत्र में जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम; जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके; तेलंगाना के जनजातीय कल्याण मंत्री श्री अदलुरी लक्ष्मण कुमार; महबूबबाद के सांसद श्री बलराम नाइक; भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी; प्रमुख चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थानों के प्रतिनिधि; राज्य सरकार के अधिकारी; और पुरे देश से लगभग 400 जनजातीय चिकित्सक उपस्थित हुए।
सभा को संबोधित करते हुए श्री मनीष ठाकुर, अतिरिक्त सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा कि जनजातीय चिकित्सकों को उनके समुदायों में पीढ़ियों से विश्वास एवं सामाजिक मान्यता प्राप्त है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) अब जनजातीय चिकित्सकों को अपने स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सहयोगी भागीदार के रूप में देखता है, विशेष रूप से निवारक देखभाल, बीमारी की शीघ्र पहचान और समय पर परामर्श जैसे क्षेत्र में। उन्होंने कहा कि भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं प्रणालीगत बाधाएं जनजातीय समुदायों की औपचारिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को सीमित करती है जबकि विश्वसनीय चिकित्सकों की सक्रिय भागीदारी अंतिम-मील तक सेवा वितरण को महत्वपूर्ण रूप से मजबूत कर सकती है।
श्रीमती रंजना चोपड़ा, सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने समुदाय-आधारित और समुदाय-प्रधान स्वास्थ्य समाधानों को मुख्यधारा में लाने में जनजातीय चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के दृष्टिकोण लागत-कुशल, स्थायी एवं स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित होते हैं। कई जनजातीय जिलों में मलेरिया, तपेदिक और कुष्ठ जैसी संक्रामक बीमारियों की लगातार प्रचलित स्थिति को उजागर करते हुए उन्होंने इन रोगों को उन क्षेत्रों से समाप्त करने के लिए अंतिम एवं लक्षित प्रयास करने की आवश्यकता पर बल दिया।
ओडिशा, महाराष्ट्र और राजस्थान के जनजातीय चिकित्सकों के साथ अपने संवाद के दौरान, सचिव ने सम्मान एवं औपचारिक मान्यता, पारंपरिक ज्ञान का पीढ़ीगत हस्तांतरण सुनिश्चित करने वाले तंत्र और दुर्लभ औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों के संरक्षण के लिए उनकी आकांक्षाओं पर ध्यान केंद्रीत किया। उन्होंने जानकारी दी कि मंत्रालय ने जनजातीय समुदायों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने में साझेदार के रूप में एक लाख जनजातीय चिकित्सकों को औपचारिक रूप से मान्यता प्रदान करने एवं सक्षम बनाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
श्री बालराम नायक, महबूबाबाद, तेलंगाना के सांसद ने कहा कि जीवनशैली से जुड़े कारणों, जैसे तंबाकू सेवन के कारण जनजातीय समुदायों में तपेदिक जैसी बीमारियां प्रचलित है। उन्होंने गौर किया कि स्कूलों, अस्पतालों, छात्रावासों एवं सामाजिक अवसंरचना में निवेश होने से ऐतिहासिक रूप से अलग-थलग रहने वाली जनजातीय आबादी में जागरूकता फैल रही है। उन्होंने बल देकर कहा कि सड़क, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में और ज्यादा निवेश गरीबी कम करने और जनजातीय विकास में तेजी लाने के लिए आवश्यक है।
श्री अद्लुरी लक्ष्मण कुमार, जनजातीय कल्याण मंत्री, तेलंगाना सरकार ने राज्य की समृद्ध जनजातीय विविधता को उजागर किया, जिसमें लगभग 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां शामिल हैं जैसे कि गोंड, कोया, चेंचू, कोलाम और कोंडा रेड्डी आदि, जिनकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराएं एवं स्थानीय ज्ञान प्रणाली हैं। उन्होंने जनजातीय-प्रधान क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-स्वास्थ्य केंद्रों को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया एवं राष्ट्रीय स्तर पर राज्य स्तरीय जनजातीय विकास प्राथमिकताओं की मजबूत करने की मांग की।
श्री दुर्गादास उइके, जनजातीय कार्य राज्य मंत्री ने कहा कि अनुसूचित जनजातियां विकसित भारत की परिकल्पना का अभिन्न अंग हैं। उन्होंने गौर किया संक्रामक एवं गैर-संक्रामक रोग अभी भी जनजातीय क्षेत्रों को प्रभावित कर रहे हैं तथा जनजातीय समुदायों ने पारंपरिक चिकित्सा एवं प्रकृति-आधारित जीवन के समृद्ध पीढ़ीगत ज्ञान को संरक्षित किया है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसे जीवनशैली रोगों के बढ़ते मामलों पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने प्राचीन ज्ञान, आधुनिक विज्ञान, तकनीक, एवं कल्याणकारी योजनाओं को मिलाकर एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने आगे कहा कि जनजातीय समुदायों की सतत जीवनशैली व्यापक समाज के लिए लचीलापन, इम्यूनिटी एवं जिम्मेदार उपभोग में मूल्यवान सबक प्रदान करती है।
श्री जुएल ओराम, जनजातीय कार्य मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि औपनिवेशिक शासन भारत की पीढ़ियों से चली आ रही स्वदेशी चिकित्सा परंपराओं को समाप्त नहीं कर सका। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए स्वदेशी उपचार पद्धतियों की प्रभावशीलता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एम्स दिल्ली, एम्स जोधपुर, आईसीएमआर भुवनेश्वर, डब्ल्यूएचओ, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आयुष मंत्रालय और अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के विशेषज्ञों द्वारा संचालित तकनीकी सत्र जनजातीय चिकित्सकों के तकनीकी ज्ञान और सेवा प्रदान करने की क्षमताओं को बहुत बढ़ावा देंगे। मंत्री ने राज्यों को पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े आजीविका के अवसर उत्पन्न करने के लिए एफएमसीजी और दवा कंपनियों के साथ बाजार संपर्क एवं साझेदारी के अवसरों का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन, पीएम-जनमन और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए) जैसी पहलों के माध्यम से जनजातीय स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने पर जनजातीय कार्य मंत्रालय का निरंतर ध्यान केंद्रीत होने की बात दोहरायी।
पूर्ण सत्र का एक प्रमुख आकर्षण जनजातीय कार्य मंत्रालय और आईसीएमआर-क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र, भुवनेश्वर के बीच भारत की पहली राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला – भारत जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला (बी-टीएचओ) की स्थापना के लिए ‘दृष्टि परियोजना’ के अंतर्गत एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर करना रहा। इस सहयोग के माध्यम से जनजातीय जिलों में जनजाति-आधारित स्वास्थ्य निगरानी, कार्यान्वयन अनुसंधान एवं शोध-आधारित रोग उन्मूलन पहल को संस्थागत बनाया जाएगा, जिसमें मलेरिया, कुष्ठ रोग और तपेदिक पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा और यह जनजाति-विशिष्ट स्वास्थ्य डेटा, विश्लेषण और साक्ष्य-आधारित योजना में लंबे समय से मौजूद राष्ट्रीय अंतर को समाप्त करेगा।
कार्यक्रम में आध्यात्मिक कल्याण एवं दैनिक जीवन में योग और ध्यान के महत्व पर एक चिंतनशील सत्र भी शामिल था, जिसे पुज्य दाजी, हार्टफुलनेस के वैश्विक गाइड और श्री राम चंद्र मिशन के अध्यक्ष ने प्रस्तुत किया। पारंपरिक वैद्य के दृष्टिकोण से समानताएं बताते हुए, उन्होंने चेतावनी दी कि जब वैद्य का निधन बिना संरचित ज्ञान हस्तांतरण किए हुए हो जाता है तो स्वदेशी ज्ञान की कई पीढ़ियां खोने का खतरा बना रहता है, विशेष रूप से जब युवा जनजातीय सदस्य पारंपरिक शिक्षा प्रणालियों से जुड़ाव बंद कर देते हैं। उन्होंने बल देकर कहा कि जनजातीय विकास केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि इसमें आजीविका सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता एवं समग्र कल्याण भी शामिल होना चाहिए। उन्होंने सीएसआर-समर्थित स्वच्छ रसोई समाधानों, जैसे कि दीर्घकालिक श्वसन संबंधी नुकसान में कमी लाने के लिए एलपीजी और उत्तराखंड में हार्टफुलनेस रिट्रीट में समुदाय-केंद्रित रोजगार मॉडलों का उदाहरण देते हुए कहा कि उद्देश्य जनजातीय चिकित्सकों को आधुनिक बनाने का नहीं होना चाहिए बल्कि उनके स्वदेशी जीवनशैली और ज्ञान प्रणालियों की पहचान करना, सुरक्षित रखना और मान्यता देना होना चाहिए, साथ ही पीढ़ी दर पीढ़ी सम्मानपूर्ण रूप से इसका संचरण सुनिश्चित करना चाहिए।
सत्रवार मुख्य बिंदु
भारत में जनजातीय स्वास्थ्य की स्थिति पर उद्घाटन तकनीकी सत्र, जिसका नेतृत्व डॉ. जया सिंह क्षत्री, वैज्ञानिक-डी, आईसीएमआर ने किया, ने जनजातीय समुदायों में असमान बीमारी के बोझ का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया, जिसमें संक्रामक रोग, कुपोषण, मातृ और शिशु स्वास्थ्य की चुनौतियां और गैर-संक्रामक रोगों का उभरता हुआ बोझ शामिल था। सत्र में दूरदराज़, कार्यबल की कमी और देखभाल में देरी के प्रभाव को उजागर किया गया और भरोसेमंद सामुदायिक कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाने का तर्क मजबूती से दिया गया।
इसके आधार पर, ओडिशा में जनजातीय स्वास्थ्य अनुसंधान एवं जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला पर सत्र, जिसे डॉ. क्षत्रिय ने प्रस्तुत किया, ने ओडिशा जनजातीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला को जनजाति-विच्छेदित डेटा उत्पन्न करने में अग्रणी पहल के रूप में पेश किया। इन निष्कर्षों से भारी मात्रा में रक्ताल्पता एवं कुपोषण, पुरानी स्थितियों के बारे में कम जागरूकता एवं नियंत्रण और महत्वपूर्ण लैंगिक असमानताएं सामने आईं, जो इस बात को दर्शाती हैं कि स्थानीय रूप से उत्पन्न साक्ष्य कैसे उत्तरदायी नीतियों को सूचित कर सकते हैं।
जनजातीय चिकित्सकों के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों का ओरिएंटेशन पर सत्र, श्री कन्नन पी., सलाहकार, एनएचएसआरसी, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित किया गया, जिसमें उपकेंद्रों से जिला अस्पतालों तक देखभाल की सतत प्रक्रिया को दर्शाया गया और जनजातीय चिकित्सकों को विश्वास, मार्गदर्शन एवं रेफरल के अंतर को पाटने के महत्वपूर्ण कनेक्टर के रूप में स्थान दिया गया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के राष्ट्रीय व्यावसायिक अधिकारी डॉ. दिलीप सिंह मैरेम्बम द्वारा जनजातीय चिकित्सकों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को मजबूत करने के वैश्विक केस स्टडीज़ पर प्रस्तुत सत्र में एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया गया। अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों ने स्पष्ट भूमिका निर्धारण, सांस्कृतिक सुरक्षा और कार्यात्मक रेफरल मार्गों के महत्व पर प्रकाश डाला, जिससे सामुदायिक लामबंदी और रेफरल एजेंट के रूप में चिकित्सकों को शामिल करने की प्रभावशीलता को बल मिला।
डॉ. प्रदीप द्विवेदी, अतिरिक्त प्रोफेसर, एम्स जोधपुर द्वारा प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में साझेदार के रूप में जनजातीय चिकित्सक सत्र ने बड़े पैमाने पर मैपिंग, दस्तावेजीकरण और प्रशिक्षण पहलों से प्राप्त सबूत साझा किए गए, जिससे यह पता चलता है कि संरचित क्षमता निर्माण न केवल संभव है बल्कि सामाजिक रूप से स्वीकार्य भी है।
रोग-विशिष्ट चुनौतियों को सिकल सेल रोग पर केंद्रित आदिवासी चिकित्सकों को शामिल करने पर भारतीय केस स्टडी पर सत्र में संबोधित किया गया, जिसका नेतृत्व डॉ. सुमित मल्होत्रा, प्रोफेसर, एम्स दिल्ली ने किया। इस सत्र में जनजातीय आबादी में सिकल सेल रोग की उच्च प्रचलन दर और 2047 तक इसके उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य को उजागर किया गया, साथ ही प्रारंभिक जांच, परामर्श, मिथक सुधार और समय पर रेफरल में आदिवासी उपचारकों की भूमिका पर बल दिया गया।
अंतिम तकनीकी सत्र, प्रतिबंधात्मक स्वास्थ्य प्रथाओं को बढ़ावा देने में आदिवासी चिकित्सकों की भूमिका की प्रस्तुति डॉ. पुखरामबम इबोटोम सिंह, उप निदेशक, आयुष निदेशालय, मणिपुर सरकार द्वारा की गई, जिसमें रोकथाम स्वास्थ्य, स्वच्छता, पोषण, नैतिकता और रोगी सुरक्षा पर व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान किया गया, जिससे जिम्मेदार, संदर्भ-उन्मुख चिकित्सक सहभागिता सुनिश्चित होती है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के अनुरूप हो।
यह कार्यक्रम जनजातीय एवं स्वदेशी विकास के दृष्टिकोण में एक बदलाव को दर्शाता है, जिसमें जनजातीय चिकित्सकों को सामुदायिक स्तर के स्वास्थ्य नेताओं के रूप में स्थापित किया गया है, जबकि जनजातीय स्वास्थ्य कार्य को वैज्ञानिक प्रमाण, संस्थागत साझेदारियों और सांस्कृतिक रूप से आधारित दृष्टिकोणों में स्थापित किया गया है। यह समावेशी, प्रमाण-आधारित और स्थायी आदिवासी विकास के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता को सशक्त बनाता है।