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नई दिल्ली में आयोजित पोंगल समारोह में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ

नई दिल्ली में आयोजित पोंगल समारोह में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ

वणक्कम! 

इनिय पोंगल नल्वाळ्तुक्कल!

आज पोंगल एक ग्लोबल फेस्टिवल बन चुका है। दुनिया भर में तमिल समुदाय और तमिल संस्कृति से प्रेम करने वाले लोग इसे उत्साह के साथ मनाते हैं, उसमें मैं भी एक हूं। इस विशेष पर्व को आप सभी के साथ मनाना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। हमारे तमिल जीवन में पोंगल एक सुखद अनुभूति की तरह है, इसमें अन्नदाता की मेहनत, धरती और सूर्य के प्रति आभार का भाव है, साथ ही ये पर्व हमें प्रकृति, परिवार और समाज में संतुलन बनाने का रास्ता दिखाता है। इस समय देश के अलग-अलग हिस्सों में लोहड़ी, मकर संक्रांति, माघ बिहू और अन्य त्योहारों की भी उमंग है। मैं भारत और दुनिया भर में रहने वाले सभी तमिल भाई-बहनों को पोंगल की और सभी पर्वों की बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। 

साथियों, 

वैसे मेरे लिए ये भी बहुत सुखद रहा है कि पिछले वर्ष मुझे तमिल संस्कृति से जुड़े कई कार्यक्रमों में शामिल होने का अवसर मिला। मैंने तमिलनाडु में एक हजार साल पुराने गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा की। वाराणसी में काशी तमिल संगमम् के दौरान सांस्कृतिक एकता की ऊर्जा को, पल-पल उसके साथ जहां भी रहा, मैं जुड़ा रहा, मैंने उसे महसूस किया। जब मैं पंबन ब्रिज के लोकार्पण के लिए रामेश्वरम गया था, तो तमिल इतिहास की महानता का फिर एक बार साक्षी बना था। हमारी तमिल संस्कृति पूरे भारत की साझी विरासत है, इतना ही नहीं, पूरी मानवता की ये साझी विरासत है। मैं ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की जिस भावना की बात करता हूं, उसे पोंगल जैसे पर्व और सशक्त बनाते हैं। 

साथियों, 

दुनिया की लगभग सभी सभ्यताओं में फसलों से जुड़ा कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। तमिल संस्कृति में किसान को जीवन का आधार माना गया है। तिरुक्कुरल में कृषि और किसानों पर विस्तार से लिखा गया है। हमारे किसान राष्ट्र निर्माण के मजबूत साथी हैं, उनके प्रयासों से आत्मनिर्भर भारत अभियान को बहुत मजबूती मिल रही है। केंद्र सरकार भी किसानों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध होकर लगातार काम कर रही है। 

साथियों, 

पोंगल का त्यौहार हमें प्रेरित करता है कि प्रकृति के प्रति आभार केवल शब्दों तक सीमित ना रहे, उसे हम जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। जब ये धरती हमें इतना कुछ देती है, उसे संजोने का दायित्व भी हमारा है। अगली पीढ़ी के लिए मिट्टी को स्वस्थ रखना, पानी को बचाना और संसाधनों का संतुलित उपयोग करना, सबसे जरूरी है। मिशन लाइफ, एक पेड़ मां के नाम, अमृत सरोवर, जैसे हमारे अभियान इसी भावना को आगे बढ़ाते हैं। हम खेती को अधिक सस्टेनेबल और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। आने वाले समय में सस्टेनेबल खेती के तरीके, वाटर मैनेजमेंट, मैं तो लगातार कहता रहा हूं, ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ नेचुरल फार्मिंग, एग्रीटेक और वैल्यू एडिशन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इन सभी क्षेत्रों में हमारे युवा नई सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं। कुछ ही महीने पहले मैं तमिलनाडु में नेचुरल फार्मिंग से जुड़े एक सम्मेलन में शामिल हुआ था। जहां मैंने देखा कि हमारे तमिल युवा कितना बेहतरीन काम कर रहे हैं, यानी प्रोफेशनल लाइफ की बड़ी-बड़ी चीजें छोड़कर के वो खेत में काम करते हुए मुझे मिले। मैं खेती से जुड़े अपने युवा तमिल मित्रों से आग्रह करता हूं कि वे सस्टेनेबल खेती में क्रांति लाने के इस अभियान का और विस्तार करें। हमारा लक्ष्य ये होना चाहिए कि हमारी थाली भी भरी रहे, हमारी जेब भी भरी रहे, और हमारी धरती भी सुरक्षित रहे। 

साथियों, 

तमिल संस्कृति दुनिया की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यताओं में से एक है। तमिल संस्कृति सदियों को जोड़ती है, वो इतिहास से सीखकर वर्तमान को आगे का रास्ता दिखाती है। इसी प्रेरणा से आज का भारत अपनी जड़ों से शक्ति लेकर नई संभावनाओं की ओर आगे बढ़ रहा है। आज पोंगल के इस पावन अवसर पर हम उस विश्वास को महसूस कर रहे हैं, जो भारत को आगे बढ़ा रहा है। एक ऐसा भारत जो अपनी संस्कृति से जुड़ा है, अपनी धरती का सम्मान करता है और भविष्य को लेकर भरोसे में भरा हुआ है। इनिय पोङ्गल् नल्वाळ्तुक्कल्! वाळ्गा तमिळ्, वाळ्गा भारतम्! एक बार फिर आप सभी को पोंगल की बहुत-बहुत बधाई, बहुत-बहुत धन्यवाद। 

वणक्कम !

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