“सांकेतिक भाषा दिवस – 2025” का उत्सव
“सांकेतिक भाषा दिवस – 2025” का उत्सव
भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (आईएसएलआरटीसी), जो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (एमओएसजेई), केंद्र सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (डीईपीडब्ल्यूडी) के तहत एक स्वायत्त निकाय है, 23 सितंबर 2025 को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 01:00 बजे तक नई दिल्ली के डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (डीएआईसी) में “सांकेतिक भाषा दिवस – 2025” मनाने के लिए एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के रूप में घोषित किया है, ताकि बधिर लोगों के मानवाधिकारों को साकार करने में सांकेतिक भाषा के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। इस वर्ष का विषय – “सांकेतिक भाषा के अधिकारों के बिना कोई मानवाधिकार नहीं” – बधिर व्यक्तियों के लिए समानता, समावेशन और गरिमा सुनिश्चित करने में सांकेतिक भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल देता है।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार की गरिमामय उपस्थिति रहेगी। केंद्रीय राज्य मंत्री श्री बी.एल. वर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सचिव श्री राजेश अग्रवाल और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें भाग लेंगे। बधिर लोगों के राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि, शिक्षक, शोधकर्ता, छात्र और अन्य हितधारक भी कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे।
प्रमुख पहलों का शुभारंभ:
इस कार्यक्रम के दौरान आठवीं राष्ट्रीय भारतीय सांकेतिक भाषा प्रतियोगिता, 2025 (देश भर के स्कूलों की भागीदारी के साथ 13 श्रेणियों में आयोजित) के विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा। बधिर छात्रों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक प्रस्तुतियां – गीत की सांकेतिक व्याख्या, मूकाभिनय और समूह नृत्य कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण होंगे।
इन पहलों से बधिर समुदाय के लिए शिक्षा, कौशल विकास, रोज़गार और सशक्तिकरण के नए मार्ग खुलेंगे। डिजिटल शिक्षण संसाधनों और नवाचारपूर्ण उपायों पर बल, पहुंच, जागरूकता और समावेशन को व्यापक रूप से बढ़ावा देगा, जो माननीय प्रधानमंत्री के “समावेशी भारत” के विजन के अनुरूप है। आईएसएलआरटीसी मीडिया प्रतिनिधियों, शिक्षकों, हितधारकों और आम जनता को आमंत्रित करता है कि वे इस संदेश को मजबूत करें कि सांकेतिक भाषा मानवाधिकार और समावेशन का एक अनिवार्य स्तंभ है।