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प्रौद्योगिकी में भारत की छलांग को नई ऊर्जा

प्रौद्योगिकी में भारत की छलांग को नई ऊर्जा

 

मुख्य बिंदु

 

परिचय

 

सरकार ने 7,280 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ ‘धातुमल दुर्लभ मृदा स्थायी चुम्बक’ के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना’ को मंजूरी दे दी है। इस पहल का उद्देश्य भारत में प्रति वर्ष 6,000 मीट्रिक टन (एमटीपीए) की एकीकृत आरईएम निर्माण क्षमता स्थापित करना है, जिसमें दुर्लभ मृदा ऑक्साइड से लेकर तैयार चुम्बक तक की पूरी श्रृंखला शामिल होगी।

इस पहल का उद्देश्य घरेलू स्तर पर एकीकृत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के माध्यम से, इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए आवश्यक एक महत्वपूर्ण घटक में आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करना है। साथ ही, यह भारत को वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत सामग्री उत्पादक बाजार में एक प्रमुख राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण, रणनीतिक क्षेत्रों के लिए सशक्त एवं लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण और देश के दीर्घकालिक नेट जीरो 2070 लक्ष्य सहित व्यापक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का प्रभावी रूप से सुदृढ़ करती है।

 

दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (आरईपीएम) क्या है?

 

आरईपीएम स्थायी चुम्बकों के सबसे शक्तिशाली में से हैं और इनका व्यापक रूप से उन तकनीकों में उपयोग किया जाता है, जिनमें ठोस और उच्च- कार्य क्षमता वाले चुंबकीय घटकों की आवश्यकता होती है। इनकी उच्च चुंबकीय शक्ति और स्थिरता इन्हें निम्नलिखित के लिए अभिन्न बनाती है:

छोटे आकार में भी अत्यधिक चुंबकीय प्रदर्शन प्रदान करने वाली आरईपीएम की क्षमता उन्हें उन्नत इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों के लिए अपरिहार्य बनाती है। भारत स्वच्छ ऊर्जा, उन्नत गतिशीलता और रक्षा जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमताओं का तीव्र विस्तार कर रहा है; ऐसे में दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता सुनिश्चित करने और आपूर्ति श्रृंखलाओं की लचीलापन बढ़ाने के लिए उच्च-प्रदर्शन चुम्बकों की विश्वसनीय और स्वदेशी आपूर्ति की व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है।

 

भारत की वर्तमान स्थिति और योजना की आवश्यकता

 

भारत में दुर्लभ-मृदा खनिजों का पर्याप्त संसाधन आधार उपलब्ध है, विशेष रूप से मोनाजाइट के समृद्ध भंडार देश के कई तटीय और अंतर्देशीय क्षेत्रों में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं। इन भंडारों में लगभग 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट की उपस्थिति का अनुमान है, जिसमें से लगभग 7.23 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा ऑक्साइड (आरईओ) निहित हैं। ये संसाधन आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र में स्थित तटीय रेतीले टीलों, लाल रेतीले टीलों तथा अंतर्देशीय जलोढ़ क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ये दुर्लभ-मृदा ऑक्साइड स्थायी चुंबक विनिर्माण सहित विविध रणनीतिक दुर्लभ-मृदा आधारित उद्योगों के लिए प्राथमिक कच्चे माल के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

इसके अतिरिक्त, गुजरात और राजस्थान के कठोर चट्टानी क्षेत्रों में लगभग 1.29 मिलियन टन इन-सीटू आरईओ संसाधनों की पहचान की गई है। वहीं, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा संचालित व्यापक अन्वेषण पहलों के परिणामस्वरूप 482.6 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा अयस्क संसाधनों का अतिरिक्त आकलन किया गया है। ये संयुक्त संसाधन अनुमान आरईपीएम विनिर्माण सहित विविध दुर्लभ-मृदा आधारित उद्योगों को दीर्घकालिक रूप से सहयोग देने हेतु पर्याप्त एवं विश्वसनीय कच्चे माल की उपलब्धता को दर्शाते हैं।

भारत में दुर्लभ-मृदा खनिजों का सुदृढ़ संसाधन आधार उपलब्ध होने के बावजूद, स्थायी चुंबकों का घरेलू विनिर्माण अभी विकासशील चरण में है, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा किया जा रहा है। आधिकारिक व्यापार आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 के दौरान भारत के स्थायी चुंबक आयात का प्रमुख भाग चीन से प्राप्त हुआ, जिसमें मूल्य के आधार पर आयात निर्भरता 59.6 प्रतिशत से 81.3 प्रतिशत तथा मात्रा के आधार पर 84.8 प्रतिशत से 90.4 प्रतिशत के बीच रही है।

इसी संदर्भ में, भविष्य की मांग के अनुमान घरेलू विनिर्माण क्षमता के त्वरित विस्तार की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तथा विभिन्न रणनीतिक अनुप्रयोगों में निरंतर वृद्धि के परिणामस्वरूप भारत में आरईपीएम की खपत के वर्ष 2030 तक दोगुनी होने की संभावना है। इसलिए घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और लचीलापन को सुदृढ़ करने हेतु एकीकृत आरईपीएम विनिर्माण क्षमता का विकास आवश्यक हो गया है।

यह योजना भारत में आरईपीएम के संपूर्ण विनिर्माण के लिए एक समग्र और सक्षम ढांचा स्थापित करती है, जो न केवल प्रारंभिक क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करता है, बल्कि दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता व आत्मनिर्भरता को भी सुनिश्चित करता है।

 

राष्ट्रीय प्राथमिकताएं और व्यापक सरकारी गतिविधियों के साथ तालमेल

 

घरेलू स्तर पर आरईएम उत्पादन क्षमता की व्यवस्था अनेक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाती है, क्योंकि ये चुंबक रणनीतिक एवं उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों के लिए अनिवार्य हैं, जो भारत की औद्योगिक और तकनीकी प्रगति के केंद्र में हैं। सरकार की यह पहल स्वदेशी उत्पादन के विस्तार, तीव्र गति से विकसित हो रहे उद्योगों के लिए आपूर्ति श्रृंखलाओं के लचीलेपन और सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा साथ-ही-साथ भारत के दीर्घकालिक सतत विकास एवं अन्य लक्ष्यों में योगदान देने का उद्देश्य रखती है।

भारत की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला रणनीति

महत्वपूर्ण खनिज प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्वों और यौगिकों का वह समूह हैं, जिनके विविध और अपूरणीय औद्योगिक अनुप्रयोग होते हैं।

समकालीन औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में खनिजों की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए महत्वपूर्ण खनिजों तक सुरक्षित व सतत पहुंच भारत के लिए एक रणनीतिक प्राथमिकता बन गई है, क्योंकि ये तकनीकी प्रगति को सक्षम बनाते हैं और आर्थिक विकास को गति प्रदान करते हैं।

जनवरी 2025 में अनुमोदित एनसीएमएम का उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों की दीर्घकालिक और टिकाऊ आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यह मिशन खनिज अन्वेषण और खनन से लेकर लाभ पहुंचाने, प्रसंस्करण तथा जीवन-चक्र के अंत में उत्पादों से पुनर्प्राप्ति तक के सभी चरणों को समाहित करते हुए भारत की महत्वपूर्ण खनिज मूल्य श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।

 

 

महत्वपूर्ण खनिजों के लिए खनन सुधार

खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (एमएमडीआर अधिनियम) खानों के विनियमन तथा खनिज संसाधनों के विकास के लिए स्थापित किया गया था। भारत के महत्वपूर्ण खनिज पारिस्थितिकी तंत्र (महत्वपूर्ण व गहरे भंडारों में पाए जाने वाले खनिजों के लिए) को सुदृढ़ बनाने हेतु, खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023 के माध्यम से इसमें सुधार किए गए हैं। इस संशोधन के तहत खनिज अन्वेषण के सभी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है, सरकार को खनिज रियायतों की नीलामी का अधिकार प्राप्त हुआ है और एक नई अन्वेषण लाइसेंस प्रणाली की शुरुआत की गई है।

 

 

वैश्विक संदर्भ और भारत के अवसर

 

दुर्लभ मृदा धातुओं और स्थायी चुम्बकों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान के दौर आए हैं, जिन्होंने इन रणनीतिक संसाधनों तक सुरक्षित और विविध पहुंच की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। भारत ने दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनमें नीतिगत सुधारों का कार्यान्वयन और घरेलू उत्पादन एवं विनिर्माण क्षमता निर्माण के प्रयास शामिल हैं।

खान मंत्रालय ने ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, जाम्बिया, पेरू, जिम्बाब्वे, मोजाम्बिक, मलावी और कोटे डी आइवर सहित खनिज समृद्ध देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते किए हैं। भारत खनिज सुरक्षा साझेदारी (एमएसपी), हिन्द-प्रशांत आर्थिक ढांचा (आईपीईएफ) और महत्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियों पर पहल (आईसीईटी) जैसे बहुपक्षीय मंचों में भी भाग लेता है, जो सामूहिक रूप से लचीली महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण के प्रयासों को मजबूती प्रदान करते हैं।

इन प्रयासों के पूरक के रूप में, खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (केएबीएल) अर्जेंटीना जैसे देशों में साझेदारी के माध्यम से लिथियम और कोबाल्ट सहित रणनीतिक खनिज संपदाओं की विदेशी खोज एवं अधिग्रहण में लगी हुई है। ये उपाय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों को सुरक्षित करने की भारत की रणनीति का एक प्रमुख घटक हैं।

खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (केएबीएल) खान मंत्रालय के अधीन नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (एनएएलको), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीएल) और मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड (एमईसीएल) का एक संयुक्त उद्यम है। इसकी स्थापना का उद्देश्य विदेशों में खनिज संपदाओं की पहचान, अन्वेषण, अधिग्रहण और विकास के माध्यम से भारत की महत्वपूर्ण व रणनीतिक खनिजों की सतत आपूर्ति सुनिश्चित करना है। इसके माध्यम से उभरती प्रौद्योगिकियों और स्वच्छ ऊर्जा उद्योगों के लिए घरेलू मूल्य श्रृंखला को सुदृढ़ करना तथा ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बल प्रदान करना भी प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है।

 

इस पृष्ठभूमि में, घरेलू आरईपीएम विनिर्माण क्षमता का विकास भारत को उन्नत सामग्रियों के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के साथ-साथ घरेलू औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने का एक उपयुक्त अवसर प्रदान करता है।

निष्कर्ष

 

धातुमल दुर्लभ मृदा स्थायी चुम्बक (आरईपीएम) के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, प्रौद्योगिकी आधारित निवेश आकर्षित करने और दीर्घकालिक विस्तारशीलता को सुदृढ़ करना लक्षित करती है। उच्च दक्षता वाली प्रणालियों में इन सामग्रियों की भूमिका को देखते हुए यह पहल भारत के ऊर्जा परिवर्तन लक्ष्यों में भी योगदान देती है। इस सरकार की पहल घरेलू क्षमता स्थापित करके और डाउनस्ट्रीम संबंधों को मजबूत करके रोजगार सृजन करने, औद्योगिक क्षमता को बढ़ाने और आत्मनिर्भर भारत तथा विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण को साकार करने में सहायक सिद्ध होगी।

 

पीआईबी शोध

संदर्भ

भारी उद्योग मंत्रालय

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2194687&reg=3&lang=2

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https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1945102&reg=3&lang=2

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शिक्षा मंत्रालय

https://satheeneet.iitk.ac.in/article/physics/physics-rare-earth-magnets/?utm

परमाणु ऊर्जा विभाग

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2147282&reg=3&lang=2

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