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प्रधानमंत्री ने पृथ्वी के भविष्य के आधार के रूप में अनुशासन, सेवा और ज्ञान के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर बल देने वाले एक संस्कृत सुभाषितम को साझा किया

प्रधानमंत्री ने पृथ्वी के भविष्य के आधार के रूप में अनुशासन, सेवा और ज्ञान के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर बल देने वाले एक संस्कृत सुभाषितम को साझा किया

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अनुशासन, सेवा और ज्ञान के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर बल देने वाले एक संस्कृत सुभाषितम को साझा किया, जो पृथ्वी के भविष्य का आधार हैं।

“सेवाभाव और सत्यनिष्ठा से किए गए कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाते। संकल्प, समर्पण और सकारात्मकता से हम अपने साथ-साथ पूरी मानवता का भी भला कर सकते हैं।

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।

सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥”

सुभाषितम् यह संदेश देता है कि सार्वभौमिक सत्य, कठोर अनुशासन, समस्त सेवा का व्रत, तपस्यापूर्ण जीवन और गहन ज्ञान द्वारा निर्देशित निरंतर कर्म– यह सभी संपूर्ण पृथ्वी का आधार हैं। हमें विशाल भूभाग प्रदान करते हुए यह पृथ्वी हमारे अतीत और भविष्य को आकार देती है।

प्रधानमंत्री ने X पर लिखा;

सेवाभाव और सत्यनिष्ठा से किए गए कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाते। संकल्प, समर्पण और सकारात्मकता से हम अपने साथ-साथ पूरी मानवता का भी भला कर सकते हैं।

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।

सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥”

सेवाभाव और सत्यनिष्ठा से किए गए कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाते। संकल्प, समर्पण और सकारात्मकता से हम अपने साथ-साथ पूरी मानवता का भी भला कर सकते हैं।

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।

सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥ pic.twitter.com/WmxwhrmYpC

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