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नए तारे की उत्पत्ति में चुंबकीय क्षेत्रों की भूमिका का पता लगा

नए तारे की उत्पत्ति में चुंबकीय क्षेत्रों की भूमिका का पता लगा

सात सौ प्रकाश वर्ष दूर, तारों की उत्पत्ति करने वाले आणविक बादलों का अध्ययन कर रहे खगोलविदों को नई जानकारी मिली है कि चुंबकीय क्षेत्र तारों की उत्पत्ति कैसे निर्देशित करते हैं।

खगोलविदों को पता चला है कि चुंबकीय क्षेत्र व्यापक बदलाव के बावजूद उल्लेखनीय रूप से जुड़े रहते हैं, और तारा बनने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

तारों की जन्मस्थली माने जाने वाले आणविक बादल कम तापमान (40 केल्विन से नीचे, तरल नाइट्रोजन से भी ठंडा) और अपेक्षाकृत उच्च घनत्व (10³ 10 कण प्रति घन सेंटीमीटर) से युक्त होते हैं। गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र और वायु प्रवाह विक्षोभ जैसी तीन प्रमुख शक्तियों के बीच जटिल परस्पर क्रिया निर्धारित करती है कि आणविक बादल किस प्रकार संकुचित होकर तारे बनाते हैं। अतः तारो की उत्पत्ति समझने के लिए आणविक बादल से लेकर संकुचित हो रहे इसके स्तर तक गैस और धूल की गतिशीलता का अध्ययन आवश्यक है।

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान-आईआईए के खगोलविदों ने अपने नए अध्ययन में, विभिन्न स्तर पर चुंबकीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए लगभग 700 प्रकाश वर्ष दूर स्थित एल328 आणविक बादल पर ध्यान केंद्रित किया।

ध्रुवीकरण अध्ययनों के उपयोग से उन्होंने आणविक बादलों से लेकर सघन तारा-निर्माण तक चुंबकीय क्षेत्रों को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण नए अवलोकन साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं।

चित्र: एल328 में मैप किए गए चुंबकीय क्षेत्र: (ए) निरंतर छवि पर व्यापक पैमाने पर क्षेत्र सदिश (विस्थापन या बल), (बी) आणविक बादल पैमाने पर क्षेत्र सदिश, (सी) आवरण पैमाने पर क्षेत्र सदिश (विभिन्न रंगों में विभिन्न एनआईआर बैंड), (डी) केंद्रीय कोर में क्षेत्र सदिश

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान और इस अध्ययन की प्रमुख प्रस्तुतकर्ता शिवानी गुप्ता ने बताया कि हमारी टीम ने एल328 में S2 उप-कोर के अध्ययन का निर्णय लिया, क्योंकि यह अत्यंत कम दीप्तिमान है। उन्होंने बताया कि S2 में प्रोटोस्टार, या निर्माणाधीन तारा, मौजूद है, जिसका प्रकाश कम है और द्विध्रुवीय प्रवाह कमजोर है। उन्होंने बताया कि कमजोर प्रवाह आसपास के वातावरण में न्यूनतम वायु प्रभाह विक्षोभ उत्पन्न करते हैं, जिससे तारा निर्माण आरंभ होने से पहले मौजूद आदिम चुंबकीय क्षेत्र के अध्ययन के लिए आदर्श प्रयोगशाला के तौर पर काम करते हैं।

एल328 कोर में चुंबकीय क्षेत्र की संरचना के अध्ययन के लिए, टीम ने अमेरिका के हवाई स्थित जेम्स क्लर्क मैक्सवेल टेलीस्कोप के POL-2 से प्राप्त ध्रुवीकरण डेटा का उपयोग किया। POL-2 ने 850 माइक्रोन की तरंगदैर्ध्य पर धूल के कणों से निकलने वाले ध्रुवीकृत उत्सर्जन का अवलोकन किया। इससे विभिन्न भागों से आने वाले प्रकाश के ध्रुवीकरण की दिशाओं का विश्लेषण कर, अनुसंधानकर्ता चुंबकीय क्षेत्रों की आकृति का मानचित्रण कर सके।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान की संकाय सदस्य और इस अध्ययन की सहलेखिका अर्चना सोआम ने बताया कि एल328 के पूर्व अध्ययनों में प्लैंक उपग्रह डेटा, ऑप्टिकल और निकट-अवरक्त (एनआईआर) ध्रुवीकरण का उपयोग कर व्यापक चुंबकीय क्षेत्रों (प्रकाश वर्ष के पैमाने से अधिक) का मानचित्रण किया गया। यह कार्य कोर पैमाने (उप-प्रकाश वर्ष) पर ज़ूम करके किया गया जहां वास्तव में तारे का निर्माण होता है।

चुंबकीय क्षेत्र बादल से लेकर छोटे कोर तक व्यवस्थित और सुसंगत पाए गए, जो उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में समग्र अभिविन्यास दर्शाते हैं। कोर-स्तरीय बी-क्षेत्र की शक्ति से संकेत मिलता है कि लघु (उप-प्रकाश वर्ष) स्तर पर बी-क्षेत्र अधिक मजबूत हो रहे हैं।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के संकाय सदस्य और सह-लेखक महेश्वर गोपीनाथन ने कहा कि एल328 कोर के गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र, वायु प्रवाह विक्षोभ और तापीय ऊर्जा की तुलना से पता चला कि पहले तीन कारक एक दूसरे के तुलनीय हैं और तापीय ऊर्जा से लगभग 10 गुना अधिक शक्तिशाली हैं। इसका मतलब है कि चुंबकीय क्षेत्र और वायु प्रवाह विक्षोभ गुरुत्वाकर्षण का प्रतिरोध करने और कोर के तारे में परिवर्तित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आईआईए और पांडिचेरी विश्वविद्यालय की शिवानी गुप्ता ने कहा कि मनोरंजन तथ्य है कि ताराविहीन लेकिन रासायनिक रूप से विकसित कोर और वेल्लो युक्त लेकिन कम रासायनिक रूप से विकसित कोर के बीच तुलनात्मक अध्ययन से पता चला कि चुंबकीय व्यवहार —चुंबकीय दबाव और गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के बीच संतुलन—तारा निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। जिन स्थितियों में कोर उप-क्रांतिक होती है, यानी चुंबकीय समर्थन गुरुत्वाकर्षण से अधिक मजबूत होता है, उनमें कोर ताराविहीन रह सकती है।

रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के मंथली नोटिस में प्रकाशित इस शोध में ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल लंकाशायर के जानिक कारोली और कोरिया एस्ट्रोनॉमी एंड स्पेस साइंस इंस्टीट्यूट के चांग वॉन ली सह-लेखक हैं।

प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.1093/mnras/stae2783

 

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