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तकनीकी हिंदी संगोष्ठी ‘अभ्युदय-3’ में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के हाल के विकास और उनके सामाजिक अंतर्संबंधों पर प्रस्तुतियां दी गईं

तकनीकी हिंदी संगोष्ठी ‘अभ्युदय-3’ में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के हाल के विकास और उनके सामाजिक अंतर्संबंधों पर प्रस्तुतियां दी गईं

सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर के सक्रिय सहयोग से तीसरी तकनीकी हिंदी संगोष्ठी- अभ्युदय-3 का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य तकनीकी हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देना और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की पहुंच समाज के व्यापक वर्गों तक विस्तारित करना था। दो दिवसीय संगोष्ठी में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए नवीनतम नवाचारों और विकास तथा उनके सामाजिक संबंधों पर शोध अध्ययन के परिणाम प्रस्तुत किए गए। शोधार्थियों ने 25 शोध पत्र प्रस्तुत किए, जिनमें मुख्य रूप से औषधीय पौधों के जैव विविधता मूल्य, जैविक अपशिष्ट निपटान, मानव-एआई सहयोग, प्रौद्योगिकी एवं सामाजिक नवाचार, राजभाषा एवं प्रौद्योगिकी का संगम जैसे विषय शामिल थे।

दिल्ली स्थित सीएसआईआर की एक प्रयोगशाला के तौर पर सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर विज्ञान संचार एवं साक्ष्य-आधारित नीति अनुसंधान के लिए अधिकृत है। संस्‍थान ने हिंदी भाषा के माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज के बीच के अंतर को दूर करने के उद्देश्य से आयोजित संगोष्ठी की अवधारणा और समर्थन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्थान निरंतर वैज्ञानिक ज्ञान को आम जनता तक, विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के माध्यम से, सुलभ बनाने की दिशा में कार्यरत है, ताकि विज्ञान संचारकों, छात्रों, शिक्षकों, नवप्रवर्तकों और नागरिकों को वैज्ञानिक ज्ञान को बेहतर ढंग से समझने और लागू करने में सहायता मिल सके।

इस कार्यक्रम के दौरान, सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर के मुख्य वैज्ञानिक और लोकप्रिय विज्ञान प्रभाग के प्रमुख श्री सी.बी. सिंह ने तकनीकी हिंदी और प्रभावी विज्ञान संचार के महत्व उल्‍लेख किया, जिससे अनुसंधान और नवाचार को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचाया जा सके। उन्होंने हिंदी में वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार में सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर के निरंतर प्रयासों का भी उल्लेख किया, जिसमें 1952 से लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका “विज्ञान प्रगति” का प्रकाशन भी शामिल है।

आईआईटी इंदौर के निदेशक, प्रोफेसर सुहास जोशी ने तकनीकी शिक्षा में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए संस्थान की पहलों का उल्‍लेख किया, जिनमें विज्ञान पर हिंदी में चर्चा, निर्धारित आधिकारिक भाषा मानकों के अनुसार पीएचडी शोधपत्रों का संकलन और अवधारणात्मक स्पष्टता बढ़ाने के लिए कुछ स्नातक व्याख्यानों का हिंदी में संचालन शामिल है। आईआईटी जोधपुर के निदेशक, प्रोफेसर अविनाश कुमार अग्रवाल ने कहा कि संगोष्ठी ने हिंदी में सार्थक तकनीकी चर्चा की शुरुआत की है और तकनीकी शिक्षा और अनुसंधान में इसके उपयोग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

इस संगोष्ठी में देशभर के प्रख्यात शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों, राजभाषा अधिकारियों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम में तकनीकी सत्र, शोधपत्र प्रस्तुति, आमंत्रित वार्ताएं, पैनल चर्चाएं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवाचार, स्टार्टअप, उच्च शिक्षा और प्रशासन में हिंदी के उपयोग जैसे समकालीन विषयों पर विशेष व्याख्यान शामिल थे।

संगोष्ठी का एक प्रमुख आकर्षण स्मारिकाका विमोचन रहा, जिसमें इस कार्यक्रम में शामिल विद्वानों के योगदानों को संकलित किया गया है। सहकर्मी समीक्षा के बाद कुल 26 शोध पत्रों को स्वीकार किया गया और प्रकाशन में संकलित किया गया। इन पत्रों को दो तकनीकी सत्रों में प्रस्तुत किया गया, जिनमें विज्ञान और अभियांत्रिकी (12 पत्र) और डिजिटल प्रौद्योगिकी और नवाचार (14 पत्र) शामिल थे। स्मारिकातकनीकी हिंदी में बढ़ते अकादमिक जुड़ाव को दर्शाती है और विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार में हिंदी के उपयोग को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रहे शोधकर्ताओं, शिक्षकों और नीति निर्माताओं के लिए एक मूल्यवान संसाधन के रूप में कार्य करती है। समापन सत्र में, सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मोहन गोरे ने दो दिवसीय संगोष्ठी के मुख्य निष्कर्षों की जानकारी दी। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के नवीनतम और सामाजिक रूप से प्रासंगिक विकास पर चर्चा करने के लिए ऐसे कार्यक्रमों की अत्‍यंत आवश्यकता है।

अभ्युदय-3” में अपने सहयोग के माध्यम से, सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर ने समावेशी विज्ञान संचार, तकनीकी हिंदी के प्रचार-प्रसार और विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सामाजिक आवश्यकताओं के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। इस संगोष्ठी ने नागरिकों को उनकी अपनी भाषा में वैज्ञानिक जागरूकता प्रदान करने में योगदान देने के साथ-साथ विज्ञान को अधिक सुलभ, सहभागी और सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनाने के व्यापक लक्ष्य का समर्थन किया।

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