Wednesday, January 28, 2026
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ऑपरेशन सिंदूर ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्वदेशी प्रणालियां भारत की परिचालन तत्परता को मजबूत कर रही हैं: रक्षा मंत्री

ऑपरेशन सिंदूर ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्वदेशी प्रणालियां भारत की परिचालन तत्परता को मजबूत कर रही हैं: रक्षा मंत्री

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया है कि स्वदेशी प्रणालियां भारत की परिचालन तत्परता को मजबूत कर रही हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सोच बन चुकी आत्मनिर्भरता को हासिल करने में डीआरडीओ की महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की। 77वें गणतंत्र दिवस परेड में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित डीआरडीओ के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले वैज्ञानिकों और तकनीकी व्यक्तियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान युद्धक्षेत्र में डीआरडीओ की तकनीक का प्रभावी ढंग से उपयोग किया गया और स्वदेशीकरण के प्रयासों के आधार पर रक्षा क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों में यह संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

 

आज के प्रौद्योगिकी युग में अग्रणी बने रहने के लिए रक्षा मंत्री ने अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया और डीआरडीओ के वैज्ञानिकों से नवीन और त्वरित सोच अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने जोखिम लेने से न डरने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी तेजी से बदल रही है। आज जो भी तकनीक नई है, वह 4-5 वर्षों में अप्रासंगिक हो सकती है। इसलिए, आज के समय में, विशेष रूप से युद्धक्षेत्र में, हमें ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत को नहीं, बल्कि सबसे तेज के जीवित रहने के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। रक्षा मंत्री ने कहा कि जो देश तेजी से सोचता है, निर्णय लेता है और प्रौद्योगिकी को लागू करता है, वही आगे रहता है।

 

श्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ से उन क्षेत्रों से आगे बढ़ने का आग्रह किया जहां निजी क्षेत्र पहले ही अपनी क्षमताएं विकसित कर चुका है। उन्होंने सुझाव दिया कि संगठन के भीतर एक अलग विंग का गठन किया जाए जो उन क्षेत्रों में जोखिम उठाए जहां सफलता की संभावना कम लगती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यदि सफलता प्राप्त होती है, तो यह ऐतिहासिक होगी।

 

रक्षा मंत्री ने शोध और प्रोटोटाइप, प्रोटोटाइप से परीक्षण और परीक्षण से तैनाती के बीच के समय को कम करने के महत्व पर बल देते हुए कहा कि सशस्त्र बलों में समय पर शामिल करना हमारे प्रदर्शन का सबसे बड़ा मापदंड होना चाहिए। उन्होंने बताया कि डीआरडीओ आमतौर पर डिजाइन और प्रोटोटाइप पर ध्यान केंद्रित करता है जबकि उत्पादन उद्योगों की भूमिका है, और इस अंतर को पाटना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मॉडलों के अनुरूप सह-विकास की रणनीति अपनाई जा सकती है, जिसमें उद्योग को शुरुआती चरणों से लेकर डिजाइन और उत्पादन तक सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है।

 

श्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उपक्रमों के साथ गहन सहयोग स्थापित करने का आह्वान करते हुए कहा कि अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़ने का समय आ गया है। उन्होंने तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमान का उदाहरण देते हुए बताया कि यह डीआरडीओ और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच ज्ञान साझा करने की मिसाल है और एक बड़ी उपलब्धि के रूप में उभरा है। ऐसी कई और उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए डीआरडीओ का अकादमिक जगत और अन्य क्षेत्रों के साथ मिलकर सहयोग करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार का समर्थन तभी सार्थक होगा जब डीआरडीओ एकाधिकारवादी अनुसंधान एवं विकास मॉडल से हटकर एक सहयोगात्मक इकोसिस्टम की ओर बढ़े और सार्वजनिक क्षेत्र, निजी उद्योगों, लघु एवं मध्यम उद्यमों, स्टार्टअप्स और अकादमिक जगत के साथ सहयोग करे। तभी हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में बड़े कदम उठा पाएंगे।

रक्षा मंत्री ने आगे कहा कि सरकार के आत्मनिर्भरता प्रयासों के कारण आज रक्षा निर्यात, बढ़कर लगभग 24,000 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। वर्ष 2014 में यह 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था। उन्होंने इसे और बढ़ाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि देश ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपए का रक्षा निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया है। डीआरडीओ को अपने सिस्टम के डिजाइन चरण से ही निर्यात बाजारों पर विचार करना चाहिए, विशेष रूप से ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और गोला-बारूद पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने से लागत की वसूली होती है, वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ती है और रणनीतिक साझेदारी मजबूत होती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि डीआरडीओ 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

 

 

श्री राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों को डीआरडीओ की असली ताकत बताते हुए, उन्हें सीखने के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके अलावा, उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारियां सौंपने और यह आश्वासन देने की बात कही कि उनके विचारों को सुना जाएगा। उन्होंने कहा कि अनुसंधान में असफलताएं होती हैं और हमें उनसे सीखना चाहिए।

 

यह कार्यक्रम डीआरडीओ द्वारा समर्पित वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और नवप्रवर्तकों को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था जिनकी प्रतिबद्धता, दृढ़ता और उत्कृष्टता देश की रक्षा क्षमताओं की मजबूत नींव का निर्माण करती है। इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ पुरस्कार योजना 2024 के विजेताओं को पुरस्कार वितरित किए। इन पुरस्कारों में शामिल हैं:

 

 

 

 

तीन सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक उत्कृष्टता पुरस्कार और दो सर्वश्रेष्ठ तकनीकी उत्कृष्टता पुरस्कार भी प्रदान किए गए। पद्म श्री डॉ. जी. चंद्रमौली (आकाश के पूर्व परियोजना निदेशक) और पद्म श्री डॉ. प्रह्लाद राम राव (आकाश के पहले परियोजना निदेशक) द्वारा सह-लिखित पुस्तक ‘द अनप्रेसिडेंटेड सक्‍सेस स्‍टोरी ऑफ द फर्स्‍ट इंडिजिनियस सुपरसोनिक मल्‍टी-टारगेट सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्‍टम-आकाश’ का विमोचन भी किया गया। यह संगठन की अनुसंधान उत्कृष्टता, विकासात्मक क्षमता और रणनीतिक दूरदृष्टि को दर्शाती है। यह पुस्तक मिसाइल प्रणाली की अवधारणा से लेकर परिचालन सफलता तक की प्रेरणादायक यात्रा का वर्णन करती है। आकाश, डीआरडीओ की वैज्ञानिक उत्कृष्टता और आत्मनिर्भर भारत की भावना का एक सशक्त प्रतीक है।

 

 

इस समारोह में रक्षा राज्य मंत्री श्री संजय सेठ, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत तथा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले डीआरडीओ के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मी अपने परिवारों सहित उपस्थित थे।

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